AI की राजनीति या राजनीतिक AI?

सांध्य प्रकाश विशेष

Jul 09, 2026 - 12:40
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उज्जैन।राजनीति में विरोध करना लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन विरोध की भी एक मर्यादा होती है। जब तर्क कमजोर पड़ने लगें, तब तस्वीरों का सहारा लिया जाता है। और जब असली तस्वीरें साथ न दें, तब AI से तस्वीरें गढ़ ली जाती हैं।जीतू पटवारी की पोस्ट ने अब बहस सरकार पर कम और उनकी राजनीतिक शैली पर ज्यादा खड़ी कर दी है। सवाल यह नहीं कि मुख्यमंत्री झुके या नहीं। सवाल यह है कि जिस तस्वीर के कोने में खुद AI Generated लिखा हो, उसे जनता के बीच किस मंशा से परोसा गया?
राजनीति में कभी कहा जाता था कि तस्वीर हजार शब्द बोलती है। अब लगता है, तस्वीर बोलती नहीं... बुलवाई जाती है
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस में ही एक ऐसे नेता हैं, जिनकी राजनीति से सहमत होना या असहमत होना अलग बात है, लेकिन उनकी कार्यशैली से बहुत लोग एक बात जरूर सीखते हैं। दिग्विजय सिंह आरोप लगाते हैं तो अपने शब्दों पर खड़े दिखाई देते हैं। वे तस्वीरों की बैसाखी कम, अपने बयान की ताकत पर ज्यादा भरोसा करते हैं। उनके बयान विवादित हो सकते हैं, लेकिन वे उन्हें अपना बताते हैं, AI का सहारा लेकर किसी दृश्य की रचना नहीं करते।शायद यही कारण है कि अस्सी वर्ष की उम्र में भी वे राजनीति शतरंज की तरह खेलते हैं।हर चाल का अगला और उससे अगला परिणाम सोचकर। राजनीति में तात्कालिक ताली से ज्यादा दूर की रणनीति पर उनका जोर दिखाई देता है।लेकिन लगता है कि नई पीढ़ी के कुछ नेताओं को वायरल होने की इतनी जल्दी है कि 'विश्वसनीय' बने रहने का धैर्य खो बैठे हैं।

आज सवाल भाजपा या कांग्रेस का नहीं है। सवाल यह है कि यदि विपक्ष AI से तस्वीरें गढ़कर हमला करेगा, तो सत्ता पक्ष कल उसी हथियार से जवाब देगा। तब जनता सच किसे मानेगी—नेता को, तस्वीर को या स्क्रीन पर चमकते AI Generated" को?
आखिर में सवाल सिर्फ जीतू पटवारी से...
1-क्या प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व अब तथ्यों से कम और तकनीक से ज्यादा लड़ेगा?
2-क्या कांग्रेस का संघर्ष अब सड़कों पर होगा या सॉफ्टवेयर पर?
और सबसे बड़ा सवाल...
क्या मध्यप्रदेश की राजनीति अब "जनाधार" से चलेगी या "जनरेटेड इमेज" से?

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