हे महाकाल आपने भी देखा ना कि अफसरों ने कितनी मेहनत की है

खरी बात - खोटा अंदाज़

Jul 16, 2025 - 01:35
Updated: 1 year ago
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साभार - फोटो भास्कर से 

उज्जैन। सावन के पहले सोमवार पर बाबा का पहला नगर भ्रमण हो गया। गनीमत है कि हो ही गया। पहले सोमवार के लिहाज से भक्तों की भीड़ और उत्साह दोनों ही कुछ ज्यादा थे। सरकारी इंतजामात भी लगभग ठीक थे। भीड़ नियंत्रण की योजना भी बनी थी। नियम भी बने थे। अपील भी की गई। ये भी कहा गया कि महाकाल दर्शन के लिए हैं, सेल्फी के लिए नहीं। भक्त सेल्फी के मोह को छोड़ दें।

खैर सवारी निकली। पूरा महकमा बाबा के प्रथम नगर भ्रमण में लगा था। लगा भी होना चाहिए। पहली बार ऐसा हुआ कि पालकी के मुख्य घेरे में आधे से ज्यादा सरकारी अफसर शामिल थे। जबकि परंपरा सिर्फ पुजारी और कहारों के रहने की है। सबको महाकाल की ऐसी चिंता थी कि खुद ही घेरे की रस्सी पकड़ कर बढ़ रहे थे। मजेदार ये है कि इतनी मशक्कत से रस्सी को पकड़े हुए लोगों के चेहरों पर खिलती हुई मुस्कुराहट थी। क्यों ना होगी बाबा की सेवा का चमत्कार ही है ये। किसी के चेहरे पर थकान का कोई निशान नहीं ना ही भीड़ के दबाव से कोई शिकन। हंसते.मुस्कुराते  रस्सी को थामे सारे आला अफसरों ने व्यवस्थाओं को माकूल बनाने में पूरा जोर लगा दिया।

और हां मजेदार बात ये है कि किसी ने सेल्फी भी नहीं ली। जिसकी अपील भी की गई थी। बस सामने से फोटो खिंचवा लिया। अब उस पर तो रोक थी नहीं ना। कलेक्टर.एसपी इस सबसे बाहर सवारी की दूसरी व्यवस्था देख ही रहे थे, तो बाकी किसी बात की चिंता किसी को थी नहीं। तो ये सारे आला अधिकारी इसी चिंता में थे कि भीड़ बेरिकेड्स तोडक़र सीधे पालकी तक ना चली आए। नगर निगम से लेकर जिला पंचायत तक मंदिर प्रशासन से लेकर विकास प्राधिकरण तक सारे आला अफसर सवारी को यादगार (संभवत: अपने लिए) बनाने की मशक्कत में लगे थे। अब प्रदेश के मुखिया जब विदेश में हैं तो अफसरों की जिम्मेदारी भी ज्यादा हो जाती है।

आम भक्तजन भले ही 30-40 फीट दूर से बेरिकेडिंग के पीछे से दर्शन कर पाएं लेकिन अधिकारियों की पूरी पलटन बाबा की पालकी के पास रहकर सारा पुण्य कमाना चाह रही थी। और क्यों ना कमाए। आखिर में ये कमाया हुआ पुण्य जनता की सेवा करने में उन्हें शक्ति ही प्रदान करेगा। आम आदमी का क्या है वो तो बाबा को दूर से देखकर भी धन्य हो ही रहा है। वो आम है तो उसकी अपेक्षाएं इच्छाएं और जरूरतें भी आम ही हैं। खास तो वो लोग होते हैं जिन्हें खास जिम्मेदारी मिलती है अधिकार मिलते हैं और ये सुविधा मिलती है कि अपने रुतबे के दम पर कहीं भी घुस जाएं। चाहे बाबा की पालकी तक ही क्यों ना पहुंचना हो। 

बाबा महाकाल भी अफसरों की ये मेहनत.मशक्कत देख रहे हैं। और हम भी चुपचाप देख ही रहे हैं।

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Comments (1)

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no needs
no needs 1 year ago
Collector office ki bahut si info hai, contact karne ka koi rasta deve