प्रशासन बे-बस है, भले ही उनके हाथ गिरेबान तक क्यों ना पहुंच जाएं

Jul 23, 2025 - 01:56
Updated: 1 year ago
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विधायक पुत्र ने महाकाल के दरबार जो आतंक मचाया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। गलती प्रशासन की है। जब आपको पता ही है कि भले आप खुद सर्वोच्च सत्ता की सेवा में लगे हैं लेकिन इंसानी सत्ता का आप कुछ बिगाड़ नहीं सकते। तो सत्ता असुरों से लड़ना ही क्यों? क्या एक विधायक पुत्र के गर्भगृह में जाने से कुछ बिगड़ जाता? वो विधायक हैं, सत्ता उनके साथ है। आप के पास क्या है? आप बे-बस हैं और प्रदेश उनकी बस में है।

महाकाल सेवकों को खुद ही सोचना चाहिए कि सत्ता वालों ने ही तो नियम बनाए हैं। कौन गर्भगृह तक जाएगा, भगवान पर किसका अधिकार ज्यादा है, पुजारी किसकी ज्यादा सुनेंगे, अधिकारी किसके पाले में खड़े रहेंगे। सारे नियम पालन करवाने वाले अधिकारी कुछ नहीं बोल पाएंगे, जब एक सत्ताधारी आपके कर्मचारी की गिरेबान पकड़ लेगा। कुछ महीनों पहले की ही तो बात है, एक आम आदमी गर्भगृह में घुस गया तो उसके खिलाफ पूरी व्यवस्था लग गई। एफआईआर हो गई, कुटाई लग गई। वो आम था लेकिन विधायक पुत्र आम नहीं होता, वो भी इंदौर के विधायक का बेटा। 

आम आदमी को लपेट देना आसान है। ये तो कर्मचारी का गिरेबान था, किसी अधिकारी का भी होता तो क्या ही फर्क पड़ रहा था। विधायक जी हैं। गर्भगृह का झगड़ा रखना ही क्यों, चौड़ी करण कर दो। शिवलिंग निकालकर नंदी हाल में स्थापित कर दो, कम से कम आम आदमी भी बाबा का स्पर्श महसूस कर सकेगा, केवल सत्ता के मदमाते हाथियों का ही अधिकार नहीं है महाकाल पर, हम सब का है। इससे भी बेहतर एक उपाय और है, सिंहस्थ की मद से 100-200 करोड़ खर्च कर दीजिए, एक महाकाल मंदिर और बना दीजिए जहां सिर्फ ऐसे सत्तावान और शक्तिशाली लोग जाकर भगवान जब चाहें छू सकें। 

आम आदमी का क्या है, वो तो हमारी तरह हमेशा चुपचाप दूर से दर्शन कर ही रहा है, करता ही रहेगा। उसे बाबा की एक झलक की लालसा है ना कि बाबा पर अनाधिकृत अधिकार जमाने की कामना है।

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