राजनीति का 'ओपन इनविटेशन'... असली दांव मंच पर नहीं, संदेश में छिपा है

सांध्य प्रकाश विशेष

Jul 07, 2026 - 06:46
Updated: 4 months ago
0 106

उज्जैन।भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएं दिखने में छोटी होती हैं, लेकिन उनके राजनीतिक मायने बहुत बड़े होते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा संघ प्रमुख मोहन भागवत को 2 अक्टूबर से शुरू होने वाली अपनी उज्जैन-अयोध्या यात्रा के शुभारंभ में आमंत्रित करना भी ऐसा ही एक कदम है। इसे केवल औपचारिक निमंत्रण मानना राजनीतिक दृष्टि से जल्दबाजी होगी। दिग्विजय सिंह उन नेताओं में हैं, जिन्होंने वर्षों तक संघ और उसकी विचारधारा पर सबसे तीखे सवाल उठाए हैं। उनके अनेक भाषण और बयान संघ की आलोचना से भरे रहे हैं। ऐसे नेता का अचानक संघ प्रमुख को सार्वजनिक मंच पर आमंत्रित करना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करता है। लेकिन राजनीति में हर सवाल का जवाब शब्दों में नहीं, रणनीति में छिपा होता है।

इस पूरे घटनाक्रम को यदि राजनीतिक विजन से देखा जाए तो यह चित भी मेरी, पट भी मेरी वाली चाल नजर आती है। यदि मोहन भागवत निमंत्रण स्वीकार कर लेते हैं तो दिग्विजय सिंह यह संदेश देने में सफल होंगे कि वैचारिक विरोध के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए। इससे उनकी उदार और संवादप्रिय छवि मजबूत होगी। यदि भागवत नहीं आते हैं, तब भी नुकसान दिग्विजय सिंह का नहीं है। तब वे यह कहने की स्थिति में होंगे कि उन्होंने संवाद की पहल की थी। यानी चर्चा फिर भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। राजनीति में कई बार घटना से ज्यादा उसकी प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है, और दिग्विजय सिंह इस कला के पुराने खिलाड़ी हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि यह निमंत्रण ऐसे समय आया है जब देश में वैचारिक ध्रुवीकरण की चर्चा लगातार हो रही है। ऐसे माहौल में विरोधी विचारधारा के सबसे बड़े चेहरे को निमंत्रण देना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है कि वे अपनी राजनीति को केवल विरोध तक सीमित नहीं रखना चाहते।
उनके इस इस निमंत्रण का कांग्रेस के कई नेता शायद अभी तक इस चाल का अर्थ समझने में लगे होंगे।यही उनकी रणनीति है।वैसे भी इतिहास गवाह है  दिग्विजय सिंह की राजनीति हमेशा पार्टी की पारंपरिक लीक से थोड़ी अलग रही है। वे अक्सर ऐसी चाल चलते हैं, जिसका विश्लेषण पहले विरोधी करते हैं और बाद में अपने साथी। उनकी राजनीति में बयान कम और संकेत ज्यादा होते हैं। यही कारण है कि उन्हें केवल नेता कहना शायद पर्याप्त नहीं होगा। वे उन विरले राजनेताओं में हैं, जो मुद्दे नहीं, विमर्श खड़ा करते हैं। उनके लिए राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने का भी खेल है। संभव है कि यह निमंत्रण भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक समीकरण में बदल जाए, और यह भी संभव है कि यह केवल प्रतीकात्मक कदम साबित हो। लेकिन इतना तय है कि दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में सबसे ताकतवर हथियार हमेशा भाषण नहीं होता, कभी-कभी एक निमंत्रण भी पूरे राजनीतिक परिदृश्य को सोचने पर मजबूर कर देता है। यही उनकी राजनीतिक शैली है।चाल ऐसी, जिसका मतलब विरोधी तब समझे, जब चर्चा शुरू हो चुकी हो।

What's Your Reaction?

Like Like 3
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User