दस लाख पौधे... या दस लाख उम्मीदें?

सांध्य प्रकाश विशेष

Jul 06, 2026 - 12:30
Updated: 4 months ago
0 82

उज्जैन।सिंहस्थ-2028 की तैयारी में नगर निगम ने 10 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया है। सुनने में शानदार लगता है। प्रेस नोट पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि कुछ साल बाद उज्जैन नहीं, छोटा-सा जंगल नजर आएगा। सवाल सिर्फ इतना है कि जंगल कागज पर उगेगा या जमीन पर भी? क्योंकि उज्जैन की जनता ने यह दृश्य पहले भी कई बार देखा है। हर मानसून में पौधारोपण होता है, फोटो खिंचते हैं, ताली बजती है, अखबार रंग जाते हैं और फिर कुछ महीनों बाद पौधे ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे उनका तबादला किसी दूसरे ग्रह पर हो गया हो।
इस बार भी 10 लाख पौधों का आंकड़ा सामने है। मगर कोई यह भी बता दे कि पिछले पांच वर्षों में लगाए गए लाखों पौधों में से आज कितने जीवित हैं? कितने पेड़ बन चुके हैं? या हर साल नई गिनती शुरू कर देना ही हरित क्रांति का सरकारी संस्करण है? दूसरा सवाल जमीन का है। दस लाख पौधे कोई गमले में तो लगेंगे नहीं। इनके लिए कितनी जमीन चाहिए? कौन-कौन से स्थान अंतिम रूप से चिन्हित हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि नक्शे में हरियाली ज्यादा है और मौके पर खाली जमीन कम?


फिर आती है खरीदी की कहानी। पौधे कहां से आएंगे? किस दर पर खरीदे जाएंगे? किस गुणवत्ता के होंगे? हरियाली का रंग सबसे पहले खरीद प्रक्रिया में दिखना चाहिए। क्योंकि कई बार पौधे छोटे होते हैं, लेकिन बिल बहुत तेजी से बढ़ जाता है। और अब सबसे महत्वपूर्ण पात्र।उज्जैन के आवारा मवेशी। शहर में जिन सड़कों पर गाय और मवेशी आराम से घूमते हैं, वहां बिना सुरक्षा के पौधे लगाना ऐसा ही है जैसे मिठाई की दुकान खुली छोड़ देना। क्या हर पौधे के लिए ट्री-गार्ड, सिंचाई और तीन साल तक रखरखाव की व्यवस्था है, या फिर पौधे अपनी किस्मत खुद लिखेंगे? क्यों कि जनता यही मानती  है कि हमारे यहां पौधारोपण का सबसे मजबूत हिस्सा फोटोग्राफर होता है। फोटो होते ही अभियान सफल मान लिया जाता है, चाहे पौधा अगले हफ्ते सूख जाए या किसी पशु का नाश्ता बन जाए। नगर निगम अगर सच में इतिहास लिखना चाहता है तो इस बार एक नया रिकॉर्ड बनाए। पौधे लगाने का नहीं, पौधे बचाने का। हर पौधे की जियो-टैगिंग जनता के लिए सार्वजनिक हो, हर तीन महीने में सर्वाइवल रिपोर्ट जारी हो, खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो और जिस अधिकारी के क्षेत्र में पौधे सूखें, उसकी भी जवाबदेही तय हो। वरना डर यही है कि 2028 में श्रद्धालुओं को छाया कम और प्रेस विज्ञप्तियों की हरियाली ज्यादा दिखाई देगी। आखिर जनता अब गड्ढों की संख्या नहीं, पेड़ों की ऊंचाई गिनना चाहती है।

फ़ोटो--अभिलाष मिश्रा
उम्मीद की किरण...
भले ही पिछले कुछ सालों में पौधरोपण का इतिहास कुछ भी रहा हो। लेकिन इस दफा उम्मीद की किरण निगमायुक्त अभिलाष मिश्रा पर केंद्रित है। जिनकी कार्यशैली अलग हटकर है। उनको लेकर यह आमचर्चा है कि जो ठान लेते है, उसे पूरा करके दिखाते है। 10 लाख पौधों का अगर लक्ष्य रखा है तो पूरी उम्मीद है कि सिंहस्थ 2028 तक कम से कम 7 लाख पौधे जरूर वृक्ष बनकर जरूर लहलहाते नजर आएंगे।

What's Your Reaction?

Like Like 1
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User